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शेयर बाजार की चकाचौंध छोड़ तराई में खेती का नया मॉडल खड़ा कर रहे विक्रमेंद्र भल्ला

विक्रमेन्द्र प्रसाद भल्ला के साथ प्रेमप्रकाश बाजपेयी व मसरूर खान
बेलरायां (लखीमपुर खीरी)- कभी दिल्ली के शेयर बाजार की चकाचौंध भरी दुनिया का हिस्सा रहे विक्रमेंद्र भल्ला आज तराई के किसानों के लिए खेती का एक नया मॉडल पेश कर रहे हैं। दिल्ली की भागदौड़ छोड़कर उन्होंने भारत-नेपाल सीमा से सटे अपने किशन नगर फार्म में पारंपरिक खेती के साथ आधुनिक कृषि और बागवानी को अपनाया है।
‘तराई की आवाज’ की टीम ने उनके फार्म पर पहुंचकर खेती और बागवानी के मॉडल को समझा।
 बातचीत में विक्रमेंद्र भल्ला ने बताया कि उनके पिता वीरेंद्र प्रसाद भल्ला जब फार्म पर खेती करते थे, उस समय वह दिल्ली में शेयर बाजार का कारोबार करते थे। फार्म पर आने के दौरान वह यहां मुख्य रूप से धान, गेहूं और गन्ने की पारंपरिक खेती देखते थे।
भारत-नेपाल सीमा से लगे होने के कारण फार्म क्षेत्र में मोहाना नदी की बाढ़ भी हर साल किसानों के लिए बड़ी चुनौती बनती थी। बाढ़ के कारण धान की फसल को भारी नुकसान होता था। विक्रमेंद्र भल्ला को शुरू से ही खेती में रुचि थी। पिता का स्वास्थ्य खराब होने के बाद जब वह फार्म पर अधिक समय देने लगे तो उन्होंने उनके साथ रहकर खेती के तौर-तरीके समझे। इसी दौरान उनके मन में खेती के पारंपरिक तरीके में बदलाव करने का विचार आया।
करीब सात वर्ष पहले पिता के निधन के बाद उन्होंने फार्म की जिम्मेदारी पूरी तरह संभाल ली। 
इसके बाद उन्होंने खेती के साथ बागवानी को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया। फार्म के बड़े हिस्से में आम, लीची और अमरूद के बाग लगाए गए हैं। इनमें उन्नत किस्म के पौधों को प्राथमिकता दी गई है। वर्तमान में फार्म में ताइवान पिंक जैसी उन्नत किस्म के अमरूद के पौधे भी लगाए गए हैं।
खेती को विविधता देने के लिए फार्म में मछली पालन के लिए तालाब और मुर्गी पालन के लिए फार्म भी बनाया गया है। वहीं, सब्जियों की खेती के लिए ग्रीनहाउस तैयार किया गया है। इस तरह एक ही फार्म में फसल उत्पादन के साथ बागवानी, मछली पालन, मुर्गी पालन और सब्जी उत्पादन को जोड़ा गया है।
विक्रमेंद्र भल्ला का मानना है कि बदलते समय में किसानों को केवल एक-दो पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहने के बजाय खेती का तरीका बदलना होगा। फसलों के साथ बागवानी, पशुपालन और अन्य कृषि गतिविधियों को अपनाने से आमदनी के अलग-अलग स्रोत तैयार होते हैं। इससे किसी एक फसल के खराब होने पर किसान को पूरी तरह नुकसान नहीं उठाना पड़ता और सालभर आमदनी का रास्ता बना रहता है।
उनका कहना है कि तराई जैसे बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में खेती को जोखिम से बचाने के लिए फसल विविधीकरण और आधुनिक बागवानी को बढ़ावा देना समय की जरूरत है।

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