संपादक की कलम से
लखीमपुर खीरी
जून के आखिरी सप्ताह की भीषण गर्मी के बाद, 28 जून की रात जब मानसून की पहली बूंदें धरती पर गिरीं, तो गर्म मिट्टी की सोंधी महक ने हर चेहरे पर मुस्कान बिखेर दी। लोगों को तपती गर्मी से राहत मिली और किसानों के चेहरे भी खुशी से खिल उठे। यह दृश्य हर वर्ष देखने को मिलता है, लेकिन इस बार भी एक बात साफ महसूस हुई—प्रकृति धीरे-धीरे बदल रही है।
एक समय था जब बारिश की पहली फुहार पड़ते ही गांवों और कस्बों के तालाबों, पोखरों और जलभराव वाले स्थानों पर पीले टोडपोल मेंढकों की टर्र-टर्र दूर-दूर तक सुनाई देती थी। लगभग पूरे बरसाती मौसम में यह प्राकृतिक संगीत वातावरण को जीवंत बनाए रखता था। लेकिन बदलते मौसम, घटती वर्षा और लगातार सिकुड़ते तालाबों ने अब इस मधुर आवाज़ को लगभग विलुप्त कर दिया है।
आज बारिश का स्वरूप भी बदल गया है। पहली बारिश में अब तालाब और पोखर पहले की तरह नहीं भरते। गांवों में मॉडल तालाब तो बनाए गए हैं, लेकिन उनमें भी शुरुआती बारिश का पर्याप्त पानी नहीं पहुंच पाता। परिणामस्वरूप, न तो जलस्रोत अपनी पुरानी पहचान पा रहे हैं और न ही मेंढकों की वह टर्राहट लौट पा रही है, जो कभी गांवों की पहचान हुआ करती थी।
यदि यही स्थिति बनी रही और तालाबों का अस्तित्व लगातार सिकुड़ता गया, तो वह दिन दूर नहीं जब गांवों की नई पीढ़ी पीले टोडपोल मेंढकों को केवल किताबों या तस्वीरों में ही देखेगी। प्रकृति का यह मौन हमें चेतावनी दे रहा है कि यदि हमने अपने पारंपरिक जलस्रोतों और पर्यावरण को नहीं बचाया, तो आने वाली पीढ़ियों से प्रकृति की कई अनमोल धरोहरें हमेशा के लिए छिन जाएंगी।
प्रेम बाजपेई-मसरुर खान
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