धारचूला ( उत्तराखंड) पिथौरागढ़ की ऊँची पहाड़ियों में एक बार फिर हलचल लौटने वाली है। लंबे इंतज़ार, अनिश्चितताओं और ठहरी हुई उम्मीदों के बाद अब वह समय आ गया है, जब सरहद पार का पारंपरिक व्यापार फिर से सांस लेगा। साल 2019 में कोविड-19 महामारी और भारत-चीन सीमा तनाव के चलते बंद हुआ यह कारोबार, 2026 में दोबारा शुरू होने जा रहा है—और इसके साथ ही सीमांत इलाकों की धड़कन भी तेज़ होने लगी है।
करीब 15,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित लिपुलेख दर्रा सिर्फ एक रास्ता नहीं, बल्कि पीढ़ियों से जुड़े रिश्तों, भरोसे और जीविका का प्रतीक रहा है। हर साल जून से सितंबर तक, जब बर्फ कुछ नरम पड़ती है, तो इसी दर्रे के रास्ते भारतीय व्यापारी तिब्बत की ओर बढ़ते हैं। इस बार भी वही कारवां तैयार हो रहा है—थोड़ा बदला हुआ, लेकिन उम्मीदों से भरा हुआ।
धारचूला और मुनस्यारी के करीब 400 से अधिक व्यापारी इस कारोबार से जुड़े हैं। उनके लिए यह सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। वर्षों से बंद पड़े इस रास्ते के फिर खुलने की खबर ने जैसे हर घर में नई ऊर्जा भर दी है। पुराने व्यापारी अपने अनुभवों को फिर से जीने को तैयार हैं, तो नई पीढ़ी पहली बार इस ऐतिहासिक व्यापार का हिस्सा बनने को उत्साहित है।
इस बार खास बात यह है कि तिब्बत के तकलाकोट में भारतीय व्यापारियों के लिए एक नई, व्यवस्थित और पक्की मंडी तैयार की गई है। पहले जहाँ अस्थायी दुकानों और सीमित सुविधाओं के सहारे काम चलता था, वहीं अब बेहतर ढांचा मिलने से कारोबार और आसान व सुरक्षित होने की उम्मीद है।
व्यापार की सूची भी लगभग वही पुरानी है—भारत से ऊनी कपड़े, जड़ी-बूटियाँ और स्थानीय उत्पाद भेजे जाएंगे, जबकि तिब्बत से ऊन और अन्य जरूरी सामान आएंगे।
लेकिन इस बार एक खास कड़ी और भी है—उत्तर प्रदेश का योगदान।
उत्तर प्रदेश के कई जिलों से तैयार होकर आने वाला गुड़, मिश्री और सुर्ती इस सीमाई व्यापार का अहम हिस्सा है। इन उत्पादों की तिब्बत और चीन के बाजारों में अच्छी मांग रहती है, और पिथौरागढ़ के रास्ते ये सामान सरहद पार पहुँचता है। इस तरह यह व्यापार सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के किसानों और व्यापारियों की आजीविका से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
प्रशासन भी इस पुनर्बहाली को लेकर पूरी तरह सक्रिय है। व्यापार पास जारी करने, मुद्रा विनिमय की व्यवस्था, और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं। सीमावर्ती इलाकों में बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जा रहा है, ताकि व्यापार बिना किसी रुकावट के सुचारू रूप से चल सके।
स्थानीय लोगों के लिए यह सिर्फ एक आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि उनकी पहचान और परंपरा का हिस्सा है। इस व्यापार के बंद होने से जहां रोज़गार पर असर पड़ा था, वहीं अब इसके दोबारा शुरू होने से उम्मीद की किरण साफ दिखाई दे रही है।
जब जून की शुरुआत में पहला जत्था लिपुलेख दर्रा की ओर बढ़ेगा, तो वह सिर्फ सामान नहीं ले जाएगा—वह अपने साथ वर्षों की प्रतीक्षा, उम्मीद और एक नए आरंभ की कहानी भी लेकर जाएगा।
उत्तराखंड से राजुल पनेरू की विशेष रिपोर्ट
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