जलवायु परिवर्तन के चलते तापमान लगातार बढ़ रहा है। आने वाले वर्षों में खास तौर पर शहरों में रहने वाले लोगों को असहनीय गर्मी का सामना करना पड़ सकता है। एशिया-प्रशांत डिजास्टर रिपोर्ट 2025 के मुताबिक शहरी इलाकों में तापमान अगले कुछ दशकों में 2°C से 7°C तक बढ़ सकता है। इससे शहरों में हीट स्ट्रेस, स्वास्थ्य संकट और ऊर्जा की मांग का दबाव बढ़ जाएगा।
HighLights
गर्मी से बच्चे और बुजुर्ग खतरे में
शहरी क्षेत्रों में तापमान अधिक
हरियाली को बढ़ावा देना आवश्यक
नई दिल्ली, विवेक तिवारी। जलवायु परिवर्तन के चलते तापमान लगातार बढ़ रहा है। आने वाले वर्षों में खास तौर पर शहरों में रहने वाले लोगों को असहनीय गर्मी का सामना करना पड़ सकता है। एशिया-प्रशांत डिजास्टर रिपोर्ट 2025 के मुताबिक शहरी इलाकों में तापमान अगले कुछ दशकों में 2°C से 7°C तक बढ़ सकता है। इससे शहरों में हीट स्ट्रेस, स्वास्थ्य संकट और ऊर्जा की मांग का दबाव बढ़ जाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले समय में बेहद गर्मी के चलते लोगों के काम करने की क्षमता में कमी आएगी। 1995 से 2030 के बीच बढ़ी गर्मी के कारण कामकाजी घंटे 3.75 मिलियन से बढ़कर 8.1 मिलियन फुल-टाइम नौकरी के बराबर खो जाएंगे। रिपोर्ट के मुताबिक बढ़ती गर्मी के चलते अनुमानित आर्थिक नुकसान लगभग 498 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच सकता है। इस बढ़ते खतरे का सबसे अधिक असर गरीब, बच्चे और बुजुर्ग अनुभव करेंगे। वहीं उच्च-आय वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोग ठंडी और हरित जगहों पर रहने वाले लोग इस जानलेवा गर्मी से कम प्रभावित होंगे।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव के चलते दिल्ली, सियोल, टोक्यो, बीजिंग, कराची, ढाका, मनीला और जकार्ता जैसे बड़े एशियाई शहरों में रहने वाले लोगों को आने वाले सालों में भीषण गर्मी का सामना करना पड़ेगा। अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव के चलते इन शहरों में तापमान में 2 डिग्री से 7 डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा तापमान महसूस होगा। इससे स्वास्थ्य सेवाएं, पीने के पानी और शरीर को ठंडा रखने के लिए इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की मांग काफी बढ़ जाएगी। वहीं गरीब और घनी बस्तियों में रहने वाले बच्चों, बुजुर्गों और खुले में काम करने वाले श्रमिकों के लिए खतरा कई गुना बढ़ जाएगा।
WHO के मुताबिक हीटवेव के चलते हीटस्ट्रोक के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। ये एक चिकित्सा आपातकाल जैसी स्थिति है। इसमें मृत्यु दर बहुत अधिक होती है। दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन के कारण भीषण गर्मी के चलते होने वाली मौतों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। 2000-2004 और 2017-2021 के बीच 65 वर्ष से अधिक आयु के लोगों के लिए गर्मी से संबंधित मृत्यु दर में लगभग 85% की वृद्धि हुई है । WHO के मुताबिक 2000-2019 के बीच हर साल गर्मी से लगभग 489 000 मौतें हुईं हैं, इनमें से 45% एशिया में और 36% यूरोप में दर्ज की गई हैं। अकेले यूरोप में 2022 की गर्मियों में, गर्मी से लगभग 61 672 अतिरिक्त मौतें हुईं
हीटवेव लंबे समय तक अत्यधिक गर्मी की स्थिति को बना कर रखती है। यहां तक कि कम और मध्यम तीव्रता वाली हीटवेव भी कमजोर आबादी के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है। इस रिपोर्ट को तैयार करने में शामिल विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण 21वीं सदी में अत्यधिक गर्मी और गर्म हवाओं की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि जारी रहेगी।
एनआरडीसी इंडिया के लीड, क्लाइमेट रेजिलिएंस एंड हेल्थ अभियंत तिवारी कहते हैं कि हमने 2008 से 2019 के बीच भारत के दस बड़े शहरों में हुई मौतों में हीटवेव के चलते हुई मौतों पर अध्ययन किया। हमने पाया कि हर साल औसतन लगभग 1116 लोगों को हीटवेव के चलते अपनी जान गंवानी पड़ी। उन्होंने कहा कि हर साल बढ़ती गर्मी आने वाले समय में बड़ी मुश्किल पैदा कर सकती है। ऐसे में हमें इसके लिए आज से ही तैयारी करनी होगी। हीटवेव जैसी स्थिति में आम लोगों को राहत पहुंचाने के लिए तत्काल कदम उठाए जाने की जरूरत है वहीं दीर्घकालिक योजना पर भी काम करना होगा। बढ़ती गर्मी का असर इंसानों के साथ ही पशु-पक्षियों, इंडस्ट्री, अर्थव्यवस्था सभी पर पड़ता है। ऐसे में तत्काल उठाए जाने वाले कदमों में गर्मी को ध्यान में रखते हुए स्वास्थ्य सुविधाओं को सुनिश्चित करना होगा। वहीं बच्चे, बूढ़े और ऐसे लोग जिन्हें विशेषतौर पर देखभाल की जरूरत है उनका ख्याल रखना होगा। वहीं दीर्घकालिक योजनाओं के तहत हमें ग्रीन कवर को बढ़ाना होगा,जलाशयों की संख्या बढ़ानी होगी। कंक्रीट के इस्तेमाल को घटाना होगा। शहरों में गर्मियों में अर्बन हीटलैंड बन जाते हैं यहां तापमान को कम करने के लिए कदम उठाने होंगे।

Post a Comment