बेलरायां (लखीमपुर खीरी)
भारत-नेपाल सीमा का तराई इलाका… एक तरफ दुधवा के घने जंगल, दूसरी तरफ मोहाना और शारदा जैसी नदियों की धाराएं और इनके बीच बसे छोटे-छोटे गांव।
इन्हीं गांवों में थारू जनजाति की जिंदगी पीढ़ियों से प्रकृति के बेहद करीब रही है। घास-फूस से बने घर, खेतों में मेहनत, जंगल से जुड़ी रोजमर्रा की जरूरतें और नदियों से मछलियां पकड़कर जीवन चलाना… यहां की जिंदगी की यही तस्वीर रही है।
समय बदला है। थारू समाज में जागरूकता और आर्थिक स्थिति पहले के मुकाबले बेहतर हुई है, लेकिन दुधवा के जंगल से सटे और विकास की मुख्यधारा से दूर इन गांवों में आज भी शिक्षा और जागरूकता की चुनौती बनी हुई है।
और इसी चुनौती को एक संकल्प में बदलने की कहानी है—तारिनी खुराना की।
दिल्ली में रहने वाली तारिनी खुराना करीब दो साल पहले भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र के किशननगर स्थित कड़ियां भल्ला फार्म पर अपने मामा विक्रमेंद्र प्रसाद भल्ला से मिलने आई थीं। फार्म के आसपास के गांवों में घूमते हुए उनकी नजर वहां रहने वाले थारू परिवारों और उनके बच्चों पर पड़ी।
बच्चों की आंखों में सपने तो थे, लेकिन उन सपनों को दिशा देने के लिए शिक्षा की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी।
यह दृश्य तारिनी के मन को भीतर तक झकझोर गया।
उन्होंने सिर्फ तस्वीर देखने के बजाय उसे बदलने का फैसला किया।
सवाल था—इन बच्चों का भविष्य कैसे बदलेगा?
जवाब बना—शिक्षा।
तारिनी खुराना ने अपने मामा विक्रमेंद्र प्रसाद भल्ला के साथ मिलकर थारू बच्चों में शिक्षा के प्रति रुचि पैदा करने की पहल शुरू की। इसी सोच ने जन्म दिया ‘विद्या वृक्ष गुरुकुल’ को।
यह सिर्फ एक शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि उन गांवों के बच्चों के लिए उम्मीद का नया दरवाजा बनकर सामने आया।
गुरुकुल में करीब तीन वर्ष की उम्र से लेकर 14 वर्ष तक के बच्चों को शिक्षा देने की शुरुआत की गई। धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ती गई और आज यहां 60 से अधिक बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। बच्चों को पढ़ाने के लिए 10 अध्यापकों की नियुक्ति की गई है।
कभी जिन बच्चों की दुनिया खेत, जंगल और नदी के आसपास सिमटी हुई थी, अब उनके हाथों में किताबें हैं। उनकी आंखों में सिर्फ रोजमर्रा की जिंदगी नहीं, बल्कि एक बेहतर भविष्य के सपने दिखाई देने लगे हैं।
यह बदलाव किसी सरकारी आंकड़े में दर्ज होने वाला बदलाव नहीं है। यह उन मासूम आंखों में दिखाई देता है, जो अब पढ़-लिखकर कुछ बनने का सपना देख रही हैं।
दुधवा के जंगल की हरियाली और भारत-नेपाल सीमा की तराई के बीच शिक्षा का यह छोटा-सा दीपक आने वाली पीढ़ी के लिए बड़ी रोशनी बनने की कोशिश कर रहा है।
तारिनी खुराना के लिए यह पहल महज एक सामाजिक कार्य नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है—
उन बच्चों को वह अवसर देने की जिम्मेदारी, जो शायद परिस्थितियों के कारण उनसे दूर था।
क्योंकि किसी समाज की असली तरक्की तब होती है, जब उसके सबसे दूर बसे गांव का बच्चा भी किताब खोलकर अपने भविष्य के बारे में सोच सके।
और भारत-नेपाल सीमा की इस तराई में ‘विद्या वृक्ष गुरुकुल’ उसी बदलाव की एक छोटी, लेकिन बेहद उम्मीद भरी शुरुआत है।
जहां कभी घास-फूस के घरों में जिंदगी सिमटी थी, वहां अब शिक्षा के सपने आकार ले रहे हैं।
जहां पीढ़ियों से जंगल जीवन का हिस्सा था, वहां अब किताबें भी जीवन का हिस्सा बन रही हैं।
और शायद यही किसी नई सुबह की पहली दस्तक है।

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