तराई की आवाज से मसरूर खान की रिपोर्ट
सिंगाही खीरी। बहराइच के निवासी सुरेश कुमार पिछले 12 वर्षों से बहरूपिया की कला के जरिए लोगों का मनोरंजन कर रहे हैं। कला की यह विरासत उन्हें अपने बाबा सरजू प्रसाद से मिली है, जो खुद पैदाइशी बहरूपिया थे।
सुरेश कुमार डाकिया, चपरासी, लैला-मजनू और ग्वाल जैसे अलग-अलग भेष धारण कर गली-मोहल्लों और मेलों में लोगों को हंसाते और सोचने पर मजबूर करते हैं। उनकी खासियत है कि हर किरदार में वह इतनी बारीकी से उतरते हैं कि दर्शक असली-नकली का फर्क भूल जाते हैं।
सुरेश का कहना है, "बहरूपिया सिर्फ भेष बदलना नहीं, एक जीवंत कहानी सुनाना है। बाबा ने यही सिखाया था कि किरदार को जियो, तभी लोगों के दिल तक बात पहुंचेगी।"
वार्ड में पांच के सभासद राहुल गुप्ता ने बताया कि आज के डिजिटल दौर में भी सुरेश कुमार इस लुप्त होती लोककला को जिंदा रखे हुए हैं। स्थानीय लोग इन्हें 'चलता-फिरता थियेटर' कहते हैं। उनकी कला न सिर्फ मनोरंजन करती है बल्कि पुरानी संस्कृति से नई पीढ़ी को जोड़ने का काम भी कर रही है।
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