तिकोनिया, लखीमपुर खीरी। नेपाल से आने वाली कर्णाली नदी की तेज धार और मोहना नदी के संगम पर 21 अगस्त को नाव पलटने के बाद लापता हुए रंजीत और बलराम का 26 दिन बाद भी कोई सुराग नहीं मिल सका है।दोनों की तलाश के लिए पुलिस और प्रशासन ने एनडीआरएफ की मदद से नदी में सर्च अभियान चलाया था, लेकिन कई दिनों की कोशिश के बाद भी सफलता नहीं मिली। अब दोनों परिवारों के सामने इंतजार, उम्मीद और अनिश्चितता के अलावा कुछ नहीं बचा है।
परिजनों का कहना है कि अगर प्रशासन कुछ दिन और तलाश अभियान चलाता और बैराज के उस पार घाघरा नदी में भी खोज की जाती, तो शायद दोनों का पता चल सकता था।
चारा लेकर लौटते समय पलटी थी नाव
तिकोनिया कोतवाली क्षेत्र के जसनगर निवासी रंजीत, बलराम और राजकुमार तथा क्योंटली गांव के अशोक 21 अगस्त को छोटी नाव से मोहना नदी पार कर खेतों में चारा लेने गए थे।
चारा लेकर लौटते समय जब नाव मोहना और कर्णाली नदी के संगम की ओर पहुंची, तभी नेपाल से आने वाली कर्णाली की तेज धार में नाव डगमगाने लगी और कुछ ही पल में पलट गई।
चारों लोग नदी की तेज धारा में बहने लगे। अशोक और राजकुमार किसी तरह तैरकर बाहर निकल आए, लेकिन रंजीत और बलराम का कोई पता नहीं चल सका।
इसके बाद पुलिस और प्रशासन ने एनडीआरएफ की टीम के साथ नदी में तलाश शुरू की। कई दिनों तक अभियान चलने के बावजूद दोनों नहीं मिले।
'रंजीत ही परिवार का सहारा था'
रंजीत की पत्नी राजकुमारी से जब तराई की आवाज की टीम ने बात की तो उनकी आवाज में पति के लौट आने की उम्मीद और उन्हें खो देने का डर दोनों साफ दिखाई दिए।
राजकुमारी बताती हैं कि रंजीत ही घर के मुखिया थे। मेहनत-मजदूरी करके वह परिवार का खर्च चलाते थे। उनके अचानक लापता होने से परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई है।
वह कहती हैं कि हादसे ने उनके परिवार की नींव हिला दी है। 26 दिन बीत जाने के बाद भी यह पता नहीं है कि रंजीत कहां हैं।
'बहू और पोते को देखकर कलेजा फट जाता है'
बलराम के पिता राम प्रसाद भी बेटे के इंतजार में हैं।
वह बताते हैं कि बलराम उनका जवान बेटा था। उसकी शादी हो चुकी है। घर में पत्नी उर्मिला और बेटा सूरज है। बेटे के लापता होने के बाद बहू और पोते को देखकर उनका कलेजा फट जाता है।
राम प्रसाद का कहना है कि परिवार ने प्रशासन से बैराज के उस पार घाघरा नदी में भी तलाश किए जाने की गुजारिश की थी, लेकिन यह कहते हुए वहां अभियान चलाने से इनकार कर दिया गया कि वह दूसरा क्षेत्र है।
उनका सवाल है कि अगर नदी की धार किसी व्यक्ति को बहाकर दूसरे इलाके में ले गई हो तो उसकी तलाश की सीमा कैसे तय की जा सकती है?
दो परिवारों के लिए 26 दिन से रुका हुआ समय
रंजीत और बलराम के परिवारों के लिए 26 दिन सिर्फ कैलेंडर की तारीखें नहीं हैं। ये 26 दिन उस इंतजार के हैं जिसमें हर गुजरता दिन उम्मीद को कमजोर करता है, लेकिन घरवालों को यह मानने भी नहीं देता कि शायद दोनों अब कभी वापस नहीं आएंगे।
हादसे में दो लोग बचकर घर लौट आए, लेकिन रंजीत और बलराम के परिवार आज भी उस नदी की ओर देख रहे हैं, जहां से उनके अपनों के लौटने की उम्मीद खत्म नहीं हुई है।
तिकोनिया से संतोष मिश्र के साथ संपादक प्रेम बाजपेई और चीफ क्रिएटर मशरूर खान की रिपोर्ट।
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